Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

जाप और ध्यान, दीवार से टिककर कर सकते है क्या

 जाप और ध्यान, दीवार से टिककर कर सकते है क्या?


हाँ, जाप और ध्यान दीवार से टिककर किया जा सकता है, विशेष रूप से यदि पीठ में दर्द हो या लंबे समय तक सीधे बैठने में कठिनाई हो। दीवार से टिककर बैठने से रीढ़ को सहारा मिलता है, जिससे ध्यान में एकाग्रता बढ़ती है। हालाँकि, आदर्श रूप से रीढ़ सीधी होनी चाहिए और शरीर स्थिर रहना चाहिए। धीरे-धीरे अभ्यास करके बिना सहारे बैठने की आदत डालना अच्छा रहेगा। यदि आवश्यक हो तो कुशन या योगासन का उपयोग करें। सबसे महत्वपूर्ण है ध्यान की गहराई और मन की स्थिरता, भले ही आप सहारे से बैठें।

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