Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

Please guide, aatmagyan hone k baad Hume kinki aradhana, Pooja, dhyaan karna chahiye? Apne aatma swaroop ka ? Ya dusre dev swaroop ka ?

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आत्मज्ञान (Self-Realization) होने के बाद साधक को अपनी आत्मा के स्वरूप को पहचानते हुए उसी की आराधना करनी चाहिए। आत्मा परमात्मा का ही अंश है, इसलिए आत्मस्वरूप की उपासना से भीतर शांति और स्थिरता आती है। साथ ही, यदि साधक किसी विशेष देवता की आराधना से जुड़ा हुआ है, तो उसे उस उपासना को भी जारी रखना चाहिए क्योंकि सभी देवता अंततः एक ही परम तत्व के विभिन्न रूप हैं। ध्यान के माध्यम से आत्मा और परमात्मा के एकत्व का अनुभव करें। निर्गुण (आत्मस्वरूप) और सगुण (देवस्वरूप) दोनों की आराधना का संतुलन बनाए रखें।

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