Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

कुछ चैनल बाले दावा करते है की यक्षिणी सिद्धि मै 3 तत्व की यक्षणि को साक्षात् दर्सन करवाते है जबकी हम लोग 5 तत्व मै होते है ....

 कुछ चैनल बाले दावा करते है की यक्षिणी सिद्धि मै 3 तत्व की यक्षणि को साक्षात् दर्सन करवाते है जबकी हम लोग 5 तत्व मै होते है ऐसा संभव कैसे फिर उनसे शादी कर लेते है कुछ लोग तो कहते है उनके उनसे बच्चे भी हुए ?


कुछ चैनल या साधक यक्षिणी सिद्धि के माध्यम से यक्षिणियों के साक्षात दर्शन, विवाह और संतान की बातें करते हैं, परंतु यह विषय आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत गूढ़ और प्रतीकात्मक है। यक्षिणियाँ वास्तव में सूक्ष्म लोक की ऊर्जा-सत्ताएं होती हैं, जो त्रिगुणात्मक (सत्व, रज, तम) और त्रि-तत्वीय (मन, बुद्धि, अहंकार) स्वरूप में प्रकट होती हैं। पाँच तत्वों से बना मानव शरीर इन सूक्ष्म तत्वों को अनुभव तो कर सकता है, पर उनका भौतिक मिलन या विवाह सामान्य समझ से परे है।

अनेक बार ऐसे अनुभव मानसिक प्रक्षेप (mental projection), तंत्र-क्रिया के प्रभाव, या गहरी ध्यानावस्था में उपजी कल्पनाएँ भी हो सकते हैं। “संतान उत्पत्ति” जैसे दावे या तो पूर्ण रूप से प्रतीकात्मक हैं (जैसे किसी शक्ति का जागरण), या भ्रमात्मक।

सावधानीपूर्वक discernment रखें, और वास्तविक साधना से हटकर चमत्कारों के पीछे न भागें। क्या आपने कभी यक्षिणी साधना का अभ्यास किया है या करने का विचार किया है?

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