प्रश्न 9. ध्यान में शरीर में कंपन महसूस हो तो क्या करना चाहिए?
मेरा प्रश्न है कि "' आत्मा का विलय "' या "' आत्मा में विलय "' होने से क्या तात्पर्य है ? जब कि , मैं ही आत्मा हूं। फिर " मैं आत्मा " किसमें या कहॉं विलिन होगा ?
आपका प्रश्न बहुत गूढ़ और आत्मचिंतन से भरा है। आपने सही कहा कि "मैं ही आत्मा हूं", लेकिन "आत्मा का विलय" या "आत्मा में विलय" का तात्पर्य आत्मा के नहीं, अहंकार और अवास्तविक 'मैं' के विलय से है।
जब कहा जाता है कि आत्मा का विलय हुआ — इसका अर्थ है कि व्यक्तिगत चेतना (जीवभाव) सर्वव्यापक चेतना (परमात्मा) में लीन हो गई।
यह वह अवस्था है जब "मैं" — जो शरीर, मन, नाम, रूप से जुड़ा है — पूरी तरह समाप्त हो जाता है, और केवल शुद्ध अस्तित्व, शुद्ध आत्मा शेष रह जाती है।
दूसरे शब्दों में, विलय का अर्थ है "स्वत्व का विसर्जन" — जब साधक यह अनुभव करता है कि न मैं शरीर हूं, न मन, न विचार — केवल एक ही सत्ता है: "सच्चिदानंद"।
तब "मैं आत्मा हूं" यह भाव भी मिट जाता है — और केवल मौन, शांति और एकत्व शेष रह जाता है। यही सच्चा विलय है।
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