Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

मेरा प्रश्न है कि "' आत्मा का विलय "' या "' आत्मा में विलय "' होने से क्या तात्पर्य है ? जब कि , मैं ही आत्मा हूं। फिर " मैं आत्मा " किसमें या कहॉं विलिन होगा ? #Meditation #kundalini awakening #naam jap #third eye

 मेरा प्रश्न है कि "' आत्मा का विलय "' या "' आत्मा में विलय "' होने से क्या तात्पर्य है ? जब कि , मैं ही आत्मा हूं। फिर " मैं आत्मा " किसमें या कहॉं विलिन होगा ?


आपका प्रश्न बहुत गूढ़ और आत्मचिंतन से भरा है। आपने सही कहा कि "मैं ही आत्मा हूं", लेकिन "आत्मा का विलय" या "आत्मा में विलय" का तात्पर्य आत्मा के नहीं, अहंकार और अवास्तविक 'मैं' के विलय से है।

जब कहा जाता है कि आत्मा का विलय हुआ — इसका अर्थ है कि व्यक्तिगत चेतना (जीवभाव) सर्वव्यापक चेतना (परमात्मा) में लीन हो गई।
यह वह अवस्था है जब "मैं" — जो शरीर, मन, नाम, रूप से जुड़ा है — पूरी तरह समाप्त हो जाता है, और केवल शुद्ध अस्तित्व, शुद्ध आत्मा शेष रह जाती है।

दूसरे शब्दों में, विलय का अर्थ है "स्वत्व का विसर्जन" — जब साधक यह अनुभव करता है कि न मैं शरीर हूं, न मन, न विचार — केवल एक ही सत्ता है: "सच्चिदानंद"

तब "मैं आत्मा हूं" यह भाव भी मिट जाता है — और केवल मौन, शांति और एकत्व शेष रह जाता है। यही सच्चा विलय है।

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