Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

गुरुजी अगर हमारे कुंडली में पितृ दोष हो तो क्या हमारे शरीर पर पितृ के सवारी आ सकती है या नहीं जरूर बताना गुरुजी

 गुरुजी अगर हमारे कुंडली में पितृ दोष हो तो क्या हमारे शरीर पर पितृ के सवारी आ सकती है या नहीं जरूर बताना गुरुजी ?


पितृ दोष का होना किसी व्यक्ति की कुंडली में पितृवात, पितृ ऋण या पितृ संबंधी अनसुलझे मामले को दर्शाता है। यह दोष आमतौर पर जीवन में चुनौतियाँ, दुख या असंतुलन का कारण बन सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि शरीर पर पितृ के "स्वारी" (आत्माएँ) आ सकती हैं।

क्या करें?

  1. पितृ तर्पण – नियमित रूप से पितृ पूजा, तर्पण और श्राद्ध कर्म करें।
  2. जप – "ॐ पितृभ्य: नम: " का जप करें।
  3. साधना – ध्यान और प्रार्थना से ऊर्जा का संतुलन बनाए रखें।
    यह सब पितृ दोष को दूर करने में मदद करेगा। 🙏

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