Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

हम जब ध्यान मे रहेते हे तो हम खुद ही दिखाई देते है इसका क्या मतलब हे

 हम जब ध्यान मे रहेते हे तो हम खुद ही दिखाई देते है इसका क्या मतलब हे?


ध्यान में स्वयं को देखना आत्मनिरीक्षण और आत्मसाक्षात्कार की ओर बढ़ने का संकेत है। यह अनुभव दर्शाता है कि आप अपनी आंतरिक चेतना के गहरे स्तरों से जुड़ रहे हैं। ध्यान के दौरान "खुद को देखना" आपके सच्चे स्वरूप, भावनाओं, विचारों या आत्मा का प्रतिबिंब हो सकता है।

यह अनुभव यह भी बताता है कि आप अपने भीतर की यात्रा कर रहे हैं और स्वयं के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। इसे सहजता से स्वीकार करें और अपनी साधना को निरंतर जारी रखें। यह आत्मज्ञान और आंतरिक शांति की ओर एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

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