Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

Kabhi kabhi dhyan karta karta main sas lana bul jata hu. Achanak yad ata hain ki mujha sas lana hain... Aysa kue hota hain

 Kabhi kabhi dhyan karta karta main sas lana bul jata hu. Achanak yad ata hain ki mujha sas lana hain... Aysa kue hota hain ?


ध्यान में गहरी एकाग्रता के दौरान श्वास का स्वतः नियंत्रण हो जाता है, और कभी-कभी हम श्वास को भूल जाते हैं। यह शरीर और मस्तिष्क की स्थिति का संकेत है, जब आप पूरी तरह से मानसिक और शारीरिक रूप से ध्यान में मग्न हो जाते हैं। यह अनुभव तब होता है जब आप ध्यान में पूरी तरह से उपस्थित होते हैं और श्वास स्वतः ही धीमा या अनियमित हो सकता है।

क्या करें:

  1. सचेतन श्वास – श्वास पर ध्यान केंद्रित करने की आदत डालें।
  2. स्मरण रखें – ध्यान करते समय श्वास को धीरे-धीरे नियंत्रित करें।
  3. धैर्य रखें – यह अनुभव धीरे-धीरे समाप्त होगा। 🙏

Comments

Popular posts from this blog

guru jee kuch dino pahle tk third eye me Blue colour ki screen dikhai deti thi pr ab kabhi kabhi green.........

परमात्मा क्यों भेजता है आत्मा को संसार में?

मैं जब दीये को एक मिनट व देखु फिर आँखे बंद करू तो दिए की ज्योति मुझें आज्ञा चक्र पर दिखाई देती है.....