Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

मुझे ध्यान करने के समय काफी दिन से ठंड लगती है, जैसे ठंडी ऊर्जा पैरो से गोल-गोल घूमती हुई सहरत्रर चक्र में निकल जाती है ये ध्यान के समय काई बार हो जाता है

 मुझे ध्यान करने के समय काफी दिन से ठंड लगती है, जैसे ठंडी ऊर्जा पैरो से गोल-गोल घूमती हुई सहरत्रर चक्र में निकल जाती है ये ध्यान के समय काई बार हो जाता है?


ध्यान के दौरान ठंड लगना और पैरों से सहस्रार चक्र तक ऊर्जा का प्रवाह महसूस होना दर्शाता है कि आपकी कुण्डलिनी ऊर्जा सक्रिय हो रही है। ठंडी ऊर्जा का अनुभव इस बात का संकेत हो सकता है कि ऊर्जा शुद्धिकरण कर रही है और ऊर्ध्वगमन (ऊपर की ओर प्रवाहित) हो रही है। यह शुभ संकेत है, लेकिन यदि आपको अधिक ठंड महसूस होती है, तो ध्यान से पहले हल्का व्यायाम करें, गर्म पानी पिएं और शरीर को ढककर रखें। सूर्य नमस्कार और मूलबंध का अभ्यास करने से ऊर्जा संतुलित होगी और ठंडक संतुलित गर्म ऊर्जा में परिवर्तित हो सकती है।

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