Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

Dhyan ho ya mantra jaap mathe par concentrate nahi ho raha hai aisa lagta koi rok raha hai pehle 6 mahine acche se hua ab nahi horaha hai

Dhyan ho ya mantra jaap mathe par concentrate nahi ho raha hai aisa lagta koi rok raha hai pehle 6 mahine acche se hua ab nahi horaha hai?


 पहले ध्यान और मंत्र जाप में जो एकाग्रता थी, उसका अब कमजोर होना ऊर्जा के असंतुलन या मानसिक अवरोध के कारण हो सकता है। यह सामान्य है, क्योंकि ध्यान की प्रक्रिया में उतार-चढ़ाव आते हैं। इसे दूर करने के लिए अनुलोम-विलोम प्राणायाम करें, जिससे ऊर्जा का प्रवाह संतुलित होगा। साथ ही, जब ध्यान में बैठें, तो पहले मन को शांत करने के लिए "ॐ" का उच्चारण करें। आज्ञा चक्र पर जबरदस्ती ध्यान लगाने की बजाय सहज रूप से अपने सांसों पर ध्यान केंद्रित करें। धीरे-धीरे एकाग्रता वापस आ जाएगी और अवरोध समाप्त हो जाएगा। 🙏

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