Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

Jay guru dev ham jyada samay tak dhyan kyo nahi laga pate kyo bhajan jyada samay tak nahikar pate

 Jay guru dev ham jyada samay tak dhyan kyo nahi laga pate kyo bhajan jyada samay tak nahikar pate?


जय गुरु देव। ध्यान और भजन में अधिक समय तक स्थिर न रह पाने का मुख्य कारण मन की अस्थिरता और विचारों का नियंत्रण में न होना है। जब हम ध्यान या भजन करने बैठते हैं, तो मन इधर-उधर भटकने लगता है और बाहरी दुनिया के विचार हमें विचलित करते हैं। इसके अलावा, शरीर की थकान, मानसिक तनाव और आंतरिक अशांति भी ध्यान को बाधित करते हैं। नियमित अभ्यास, सांसों पर ध्यान केंद्रित करना और भजन के अर्थ को समझकर भावपूर्वक गाने से मन स्थिर होगा। धीरे-धीरे ध्यान और भजन का समय बढ़ने लगेगा।

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