Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

jb se m dhyan krne lg gyi hu...muje gussa bht jyada aa rha hai...kya kru plz btaaye

  jb se m dhyan krne lg gyi hu...muje gussa bht jyada aa rha hai...kya kru plz btaaye ?


जब हम ध्यान करना शुरू करते हैं, तो भीतर दबी हुई भावनाएँ सतह पर आने लगती हैं। गुस्सा बढ़ना इस बात का संकेत हो सकता है कि आपकी ऊर्जा जाग्रत हो रही है और कुछ पुरानी भावनाएँ निकल रही हैं। इसे शांत करने के लिए नियमित रूप से गहरी सांस लें, ठंडे पानी से स्नान करें और ‘शांतं, शांतं’ मंत्र का जाप करें। 7 चक्र ध्यान करते समय विशेष रूप से मूलाधार और मणिपुर चक्र पर संतुलन बनाए रखें। अगर गुस्सा आए, तो कुछ देर टहलें या हल्का योग करें। धीरे-धीरे यह स्थिति बेहतर हो जाएगी।

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