Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

Kaal chakar dhiyan kaise ki jati h kripya kar bataye

 Kaal chakar dhiyan kaise ki jati h kripya kar bataye ?


काल चक्र ध्यान समय (काल) और चेतना के चक्र को संतुलित करने की एक गूढ़ साधना है। इसे करने की विधि इस प्रकार है:

  1. शांत स्थान पर बैठें, रीढ़ सीधी रखें।
  2. आंखें बंद करके गहरी सांस लें और मन को शांत करें।
  3. मन में एक चक्र (घड़ी) की कल्पना करें, जो समय का प्रतीक है।
  4. उस चक्र को धीरे-धीरे घूमते हुए देखें, जिसमें भूत, वर्तमान और भविष्य एक साथ समाहित हों।
  5. मन में "ॐ कालाय नमः" मंत्र का जाप करें।
  6. स्वयं को समय से परे, शून्य अवस्था में अनुभव करें।

नियमित अभ्यास से समय के बंधन से मुक्ति और उच्च चेतना की अनुभूति होगी। 🙏

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