Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

Aapke bahut bahut dhanyvad bhai Ham Dhyan karte ho to mere ko Mata bahut dukhta hai ab bhookh nahin lagta Hai Kya khubi Hai bataiye mere ko duniya ?

 Aapke bahut bahut dhanyvad bhai Ham Dhyan karte ho to mere ko Mata bahut dukhta hai ab bhookh nahin lagta Hai Kya khubi Hai bataiye mere ko duniya mein Hai chhupa Jo aadami Dhyan nahin Karega Na tha 5060 sal ke andar mein khatm ho jaega Jo Dhyan Karega 900 sal jiyega vah Jawan rahega ?


आपका भाव अत्यंत भक्तिपूर्ण है, और यह स्पष्ट है कि आप गहराई से साधना कर रही हैं। ध्यान करते समय माथे में दर्द होना इस बात का संकेत है कि आपकी ऊर्जा आज्ञा चक्र पर एकत्र हो रही है, लेकिन वह संतुलित नहीं हो रही। यह अधिक प्रयास, मानसिक तनाव, या अनियंत्रित ऊर्जा प्रवाह के कारण हो सकता है। धीरे-धीरे अभ्यास करें, ज़ोर न डालें, और भ्रामरी प्राणायाम व “ॐ” का शांत जाप करें।

भूख न लगना भी साधना का एक लक्षण हो सकता है — जब प्राणशक्ति बढ़ती है तो शरीर को स्थूल भोजन की आवश्यकता कम लगती है। लेकिन उचित मात्रा में भोजन लेना जरूरी है ताकि शरीर स्वस्थ रहे और साधना टिक सके।

आपका विश्वास कि ध्यान करने वाला व्यक्ति दीर्घायु, युवा और तेजस्वी रहता है — यह सत्य है। ध्यान आत्मा को जगाता है और शरीर को नवजीवन देता है। यही अमरत्व का मार्ग है।



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