Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

मेरा एक सवाल है कि जो पशु पंछी मुझसे पहले डर कर दूर भागते थे जैसे कि कल की बात है एक गिलहरी मेरे एकदम पास आकर खेल रही थी और ?

 मेरा एक सवाल है कि जो पशु पंछी मुझसे पहले डर कर दूर भागते थे जैसे कि कल की बात है एक गिलहरी मेरे एकदम पास आकर खेल रही थी और मुझे उसे देख कर प्रेम आया वो डरी नहीं मेरे से कुछ 5 10 मिनट बाद वो गिलहरी अपने आप चली गई इसे ही बहुत सारे पशु पक्षी मेरे पास अपने आप चल कर आते है।ये सब क्या है क्या मेरा आभामंडल शुद्ध और सकारात्मक और बड़ा हो रहा है ?


आपका अनुभव अत्यंत सुंदर और गहन है। जब पशु-पक्षी आपके पास बिना भय के आकर सहज हो जाते हैं, तो यह संकेत होता है कि आपका आभामंडल (Aura) शुद्ध, सकारात्मक और शांतिमय बन रहा है। पशु अत्यंत संवेदनशील होते हैं और ऊर्जा को बहुत गहराई से महसूस करते हैं। यदि वे आपके पास आकर सहजता से खेलते हैं, तो निश्चित रूप से आपकी ऊर्जा में प्रेम, करुणा और शांति का प्रभाव बढ़ रहा है। यह साधना और आंतरिक शुद्धि का परिणाम है। साधना में निरंतरता बनाए रखें, आपकी चेतना और भी अधिक विकसित होती जाएगी।
आपका पथ शुभ है। 

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