Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

Kya aapne permatma ko dekha h guru ji... Jo es pure kul duniya ka malik h.. ?

 Kya aapne permatma ko dekha h guru ji... Jo es pure kul duniya ka malik h.. ?


बेटी, परमात्मा को आँखों से देखना संभव नहीं, क्योंकि वे निराकार हैं — रूप से परे, शब्दों से परे। लेकिन जब साधना गहराती है, तो एक अनुभव होता है जो शब्दों में नहीं समा सकता। वह अनुभूति — प्रेम, शांति, आनंद और पूर्णता की — वही परमात्मा का साक्षात्कार है। मैंने उसे रूप में नहीं देखा, परंतु उनके दर्शन को हृदय में महसूस किया है। वे हर श्वास में, हर कण में बसते हैं। जब मन शांत होता है, अहं मिटता है, तब भीतर से एक आवाज़ आती है — "मैं हूँ।" वही परमात्मा है। उसे अनुभव करो, देखना अपने आप हो जाएगा।

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