Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

mera swal h ki Dhyan k doran mere left nostril se hi sans ata h left body hi grm hoti ya jhukav hota h .. ?

 mera swal h ki Dhyan k doran mere left nostril se hi sans ata h left body hi grm hoti ya jhukav hota h .. ?


ध्यान के दौरान केवल बाईं नासिका (Left Nostril) से साँस आना और शरीर के बाईं ओर गर्मी या झुकाव महसूस होना इड़ा नाड़ी (Ida Nadi) के सक्रिय होने का संकेत है। इड़ा नाड़ी चंद्र स्वर से जुड़ी होती है, जो शीतलता, भावनाओं और मानसिक शांति का प्रतीक है। परंतु जब यह अधिक सक्रिय हो जाती है, तो शरीर का संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे एक तरफ झुकाव या गर्मी जैसा अनुभव होता है।

उपाय:

  1. नाड़ी शोधन प्राणायाम करें।

  2. दाएँ नथुने से थोड़ी देर साँस लें (सूर्य भेदी)।

  3. रीढ़ को सीधा रखें।

  4. ध्यान में संतुलन बनाए रखें।

ये अवस्था अस्थायी है, घबराएँ नहीं।

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