Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

पहले सिर्फ ध्यान हि करता था जाप नही तब भी third eye के अनुभव होते थे अब 4 माह से om namah shivay का जाप करता हु तो अनुभव ज्यादा होते है क्या सिर्फ जाप हि करु या ध्यान भी ??

 पहले सिर्फ ध्यान हि करता था जाप नही तब भी third eye के अनुभव होते थे अब 4 माह से om namah shivay का जाप करता हु तो अनुभव ज्यादा होते है क्या सिर्फ जाप हि करु या ध्यान भी ??


पहले जब आप सिर्फ ध्यान करते थे और जाप नहीं, तब भी तीसरी आँख (third eye) के अनुभव हो रहे थे — इसका मतलब है कि आपकी साधना में प्राकृतिक गहराई है। अब जब आप 4 महीने से "ॐ नमः शिवाय" का जाप कर रहे हैं, तो अनुभव और भी तेज हो गए हैं, जो बहुत शुभ संकेत है। जाप (मंत्र शक्ति) और ध्यान (शांति शक्ति) दोनों मिलकर साधना को पूर्ण बनाते हैं।
इसलिए केवल जाप या केवल ध्यान नहीं, दोनों का संतुलन जरूरी है।
पहले जाप करो, फिर उसी ऊर्जा में ध्यान में बैठो।

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