Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

हम जब ध्यान करते हैं उसे परमात्मा को पाने के लिए तो हमें किन कर्मों पर निर्भर रहना चाहिए ?

 हम जब ध्यान करते हैं उसे परमात्मा को पाने के लिए तो हमें किन कर्मों पर निर्भर रहना चाहिए ?


जब हम ध्यान परमात्मा को पाने के लिए करते हैं, तो हमारे कर्म शुद्ध, निष्काम और सत्कर्म होने चाहिए। सबसे पहले, सत्य और अहिंसा का पालन करना आवश्यक है। स्वार्थरहित सेवा, दया, क्षमाशीलता, और विनम्रता जैसे गुण हमारे कर्मों में हों। भोजन सात्विक हो, वाणी मधुर हो, और हर कार्य में परमात्मा का स्मरण बना रहे। ध्यान, जप, साधना के साथ-साथ दिनचर्या भी संयमित और सच्ची होनी चाहिए। अपने जीवन को तप, त्याग और प्रेम से भरें। जब कर्मों में पवित्रता आती है, तभी ध्यान गहरा होता है और परमात्मा की अनुभूति संभव होती है।

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