Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

Dhyan Mein Anubhav Kyon Nahin ho rahe pahle Jaise usko Kaise laen Dobara se ?

 Dhyan Mein Anubhav Kyon Nahin ho rahe pahle Jaise usko Kaise laen Dobara se?


ध्यान में पहले जैसे अनुभव न होना अक्सर दो कारणों से होता है: या तो मन में अपेक्षा और焦虑 बढ़ गई है, या ऊर्जा असंतुलित हो गई है। जब हम अनुभव की इच्छा लेकर ध्यान करते हैं, तो मन शांत नहीं हो पाता और गहराई छिन जाती है।

उपाय:

  1. बिना अपेक्षा के, केवल "साक्षी भाव" से ध्यान करें।

  2. सुबह या ब्रह्म मुहूर्त में ध्यान करें – वह समय प्रभावी होता है।

  3. नियमित प्राणायाम (विशेष रूप से अनुलोम-विलोम) करें – ऊर्जा संतुलित होगी।

  4. 108 बार "ॐ" का जाप करें – चित्त शुद्ध होगा।


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