Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

guru g mai dhyaan krti aa rhe hun 8 months se but abh meri sadhna km hai but dimag me thoughts aane lge hai abh or wo b negative plz is k liye btaye mai kya kru ?

 guru g mai dhyaan krti aa rhe hun 8 months se but abh meri sadhna km hai but dimag me thoughts aane lge hai abh or wo b negative plz is k liye btaye mai kya kru ?


8 महीने की साधना के बाद साधना में कमी आने पर मन में नकारात्मक विचार आना सामान्य है। जब ध्यान कम होता है, तो मन की पकड़ बढ़ जाती है और विचार—विशेषकर नकारात्मक—उभरने लगते हैं।

क्या करें:

  1. प्रतिदिन कम से कम 15–20 मिनट का ध्यान ज़रूर करें, चाहे मन न भी लगे।

  2. "सोऽहम्" या "राम" नाम का मानसिक जप करते रहें।

  3. सुबह-शाम सकारात्मक संगीत या मंत्र सुनें।

  4. नकारात्मक विचारों को देखें, लेकिन उनसे जुड़ें नहीं—साक्षी भाव रखें।

आपकी साधना रुकी नहीं है, बस थोड़ी दिशा बदल रही है। श्रद्धा बनाए रखें।

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