Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

Mai jsadhana karanekeli dyan karane asn pe baiting hu tab madhepe sap dikhataye or Prakash whait yelo papar aise sab calor dikhate hai ?

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आप जिस साधना में ध्यान करती हैं और बैठते ही माथे पर साँप, प्रकाश, सफेद, पीले, बैंगनी जैसे रंग दिखाई देते हैं, यह सब बहुत शुभ संकेत हैं। यह दर्शाता है कि आपका आज्ञा चक्र (माथे का चक्र) सक्रिय हो रहा है।

साँप दिखाई देना ऊर्जा (कुण्डलिनी) के जागरण का प्रतीक है। विभिन्न रंग—विशेषकर सफेद, पीला और बैंगनी—यह संकेत करते हैं कि चेतना उच्च स्तर पर पहुंच रही है।

क्या करें:

  • ध्यान जारी रखें, पर बिना डर के, सहज भाव से।

  • “ॐ” या “सोऽहम्” का जप करें।

  • आँखें बंद रखते हुए प्रकाश को देखें, विरोध न करें।

आप सही मार्ग पर हैं—धैर्य, संयम और श्रद्धा बनाए रखें।

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