Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

Mere ander aag lagi hui h permatma ko jaaneee ki...tadaff rha hu apne malik k bina.... ?

 Mere ander aag lagi hui h permatma ko jaaneee ki...tadaff rha hu apne malik k bina....per mjhe samj ni aa rha h ...kaha se kaise shuru kru...qki chalte firte kaam krte hue mera dhyaan to permatma ki trff rehta he h ...usse aage ni ja pa rha hu.... kripya margdarshan kre .?


आपके भीतर जो परमात्मा को जानने की आग लगी है, वही सच्ची साधना की शुरुआत है। यह तड़प ही सबसे बड़ा वरदान है, क्योंकि बिना तड़प के खोज नहीं होती। आप जहाँ हैं, वहीं से शुरुआत करें—शरीर, मन और प्राण को संतुलित करके।

मार्गदर्शन:

  1. नियमितता: रोज एक निश्चित समय पर शांत बैठें—चाहे 15 मिनट ही क्यों न हों।

  2. जप: अपने इष्ट का नाम जपें, जैसे "ॐ नमः शिवाय", "राम", या "ॐ"

  3. प्राणायाम: धीरे-धीरे अनुलोम-विलोम से प्राण को स्थिर करें।

  4. साक्षी भाव: विचार आएं तो बस देखें, उनसे न लड़ें।

  5. सेवा: दूसरों की सेवा करें, यह हृदय को शुद्ध करता है।

चलते-फिरते भी ध्यान का भाव अच्छा है, लेकिन स्थिर बैठकर आत्मा से मिलना जरूरी है। यही भीतर का मंदिर है।

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