mujhe fragnances atti hai jaise hawan ki....dheyan bhi lgta hai ...agge kya kre.

mujhe fragnances atti hai jaise hawan ki....dheyan bhi lgta hai ...agge kya kre...meri body sometimes raat ko ajib c sikudne lgti hai jaise body main kuch khivh rha ho...ye kya hai n agge kya krain ??  यदि ध्यान के दौरान या उसके बाद आपको हवन जैसी सुगंध का अनुभव होता है और ध्यान भी सहज लगने लगता है, तो आध्यात्मिक परंपराओं में ऐसे अनुभवों को कभी-कभी मन की सूक्ष्म एकाग्रता या साधना के दौरान होने वाले आंतरिक अनुभवों के रूप में देखा जाता है। इसी प्रकार, रात में शरीर का सिकुड़ना या भीतर कुछ खिंचने जैसा महसूस होना भी कुछ साधकों को ध्यान के समय अनुभव हो सकता है। लेकिन केवल इन अनुभवों के आधार पर किसी निश्चित आध्यात्मिक अवस्था का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। आपका लक्ष्य अनुभवों का संग्रह नहीं, बल्कि मन की स्थिरता, नाम सिमरन और ईश्वर के प्रति प्रेम होना चाहिए। यदि ये अनुभूतियाँ बिना दर्द और भय के हैं, तो शांत रहकर नियमित साधना जारी रखें। लेकिन यदि शरीर का सिकुड़ना, दर्द, घबराहट या अन्य असामान्य लक्षण बार-बार हों या बढ़ने लगें, तो किसी योग्य चिकित्सक से भी अवश्य जाँच कराएँ, ताकि किसी शारीरिक...

Permatma ne j duniya q baniee guruji... Usse phele permatma khud kaise bane ..??

 Permatma ne j duniya q baniee guruji... Usse phele permatma khud kaise bane ..?? Plz guru ji....swarg nark kya h ....uper k duniya k bare Mai btayooo...kis system se chalta h waha sab .??


तुम्हारा प्रश्न बहुत गहरा है — जो हर जिज्ञासु साधक के मन में आता है। परमात्मा ने यह सृष्टि इसलिए रची क्योंकि वह स्वरूपानंद हैं — आनंद में स्थित, लेकिन उस आनंद को अभिव्यक्त करने की इच्छा से यह जगत बना। जैसे एक फूल अपनी खुशबू फैलाता है, वैसे ही परमात्मा ने इस सृष्टि को रचा — लीला के रूप में।

परमात्मा स्वयं अजनमा हैं — उनका कोई आरंभ नहीं है, वे अनादि हैं। वे कभी “बने” नहीं, वे सदा से हैं। हम जैसे जीव काल के अधीन हैं, लेकिन परमात्मा काल के परे हैं।

स्वर्ग और नरक सूक्ष्म लोक हैं — ये भौतिक नहीं, मानसिक और आत्मिक अवस्था हैं। अच्छे कर्म करने वाले आत्मा सूक्ष्म रूप से स्वर्गीय लोकों में सुख भोगते हैं, और बुरे कर्म करने वाले कुछ समय नरक जैसी स्थिति में रहते हैं। ये सब कर्मों पर आधारित न्यायिक व्यवस्था से चलते हैं — इसे कर्मफल सिद्धांत कहते हैं।

ऊपरी लोकों का संचालन दिव्य शक्तियों द्वारा होता है — जैसे इंद्र, यम, वरुण आदि। लेकिन ये सब भी परमात्मा की इच्छा से संचालित होते हैं। इसीलिए अंतिम लक्ष्य स्वर्ग नहीं, मोक्ष है — जहाँ आत्मा पूर्ण रूप से परमात्मा में लीन हो जाती है।

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