Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

प्रणाम गुरुदेव जी मेरे शरीर के अंगों में बार बार फड़कन क्यू होती है.. काई बार दो दिन तक एक ही अंग में फड़कन होती रहती है क्या करण है

 प्रणाम गुरुदेव जी मेरे शरीर के अंगों में बार बार फड़कन क्यू होती है.. काई बार दो दिन तक एक ही अंग में फड़कन होती रहती है क्या करण है?



आध्यात्मिक कारण (यदि ध्यान करते हैं)

  • अगर आप ध्यान या आध्यात्मिक साधना में हैं, तो शरीर में ऊर्जा का प्रवाह बढ़ सकता है, जिससे यह कंपन महसूस होता है। इसे अक्सर कुंडलिनी ऊर्जा जागरण का संकेत माना जाता है।
  • ध्यान और प्राणायाम करें:
    • अनुलोम-विलोम और भ्रामरी प्राणायाम करने से मस्तिष्क शांत होता है और मांसपेशियों की उत्तेजना कम होती है।
  • नींद पूरी करें:
    • रोज़ाना 7-8 घंटे की गहरी नींद लें।
    • आध्यात्मिक दृष्टिकोण (यदि साधना करते हैं):

      • अगर यह ऊर्जा जागरण का परिणाम है, तो इसे डर या परेशानी की तरह न लें। यह सकारात्मक प्रक्रिया का संकेत हो सकता है।

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