Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

Guruji bahut drd hota urja chalti to rid ki haddi me drd hota gale me drd hota estrh kyo hota ? #Meditation #kundalini awakening #naam jap #third eye

 Guruji bahut drd hota urja chalti to rid ki haddi me drd hota gale me drd hota estrh kyo hota ?


जब साधना में ऊर्जा (कुंडलिनी) जाग्रत होकर ऊपर की ओर बढ़ती है, तो वह रीढ़ की हड्डी, गला, और अन्य चक्रों से होकर गुजरती है। इस यात्रा में यदि शरीर शुद्ध न हो या चक्र अवरुद्ध हों, तो दर्द, खिंचाव या जलन जैसी पीड़ाएँ अनुभव होती हैं।

रीढ़ में दर्द दिखाता है कि ऊर्जा सुषुम्ना में प्रवाहित हो रही है।
गले में दर्द इंगित करता है कि विशुद्ध चक्र पर रुकावट है — यह बोलने, सत्य कहने या भावनाओं को दबाने से जुड़ा होता है।

इसका समाधान:

  1. रीढ़ सीधी रखें और रोज हल्के प्राणायाम करें।

  2. ध्यानपूर्वक “हं” बीज मंत्र का जप करें।

  3. गर्म पानी पीएं, विश्राम करें।

यह सब अस्थायी है, धीरे-धीरे ठीक होगा। डरें नहीं, यह उन्नति का संकेत है।

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