Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

गुरूजी मेरे ध्यान में मैं क्यों दिखाई देती हूं भगवान शिव जी के साथ बल्कि मां के दर्शन होना चाहिए

 गुरूजी मेरे ध्यान में मैं क्यों दिखाई देती हूं भगवान शिव जी के साथ बल्कि मां के दर्शन होना चाहिए?


ध्यान में भगवान शिवजी के साथ स्वयं को देखना आत्मा की आपकी गहरी यात्रा और चेतना के जागरण का संकेत हो सकता है। भगवान शिव ध्यान, त्याग, और आत्मज्ञान के प्रतीक हैं। जब आप शिवजी के साथ स्वयं को देखते हैं, यह आपके भीतर की दिव्यता और शिव तत्व से जुड़ने का संकेत है। मां के दर्शन न होना उनकी अनुपस्थिति नहीं, बल्कि यह संकेत हो सकता है कि अभी आपकी चेतना शिव तत्व पर केंद्रित है। धैर्य रखें, मां के दर्शन भी समय आने पर होंगे। ध्यान में जो भी अनुभव हो, उसे स्वीकार करें और विश्वास बनाए रखें।

Comments

  1. Guru ji mujhe abhi tak kuch bhi feel nahi hua hai.. Mai 4 dino se kar raha hoo

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