Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

गुरु जी मेरा मूलाधार चक्र पर बहुत तेजी से खुजुली होती है क्या है

 गुरु जी मेरा मूलाधार चक्र पर बहुत तेजी से खुजुली होती है क्या है?


मूलाधार चक्र पर तेज खुजली या गुदगुदी जैसा अनुभव ऊर्जा के जागरण का संकेत हो सकता है। यह चक्र हमारे आधार (जड़) से जुड़ा होता है और जब यह सक्रिय होने लगता है, तो शरीर में ऊर्जा प्रवाह तीव्र हो सकता है। खुजली या हलचल उस क्षेत्र में संचित ऊर्जा या अवरोधों के हटने का परिणाम हो सकती है। इसे सामान्य मानें, लेकिन संतुलित ध्यान और प्राणायाम करते रहें ताकि ऊर्जा सहजता से ऊपर की ओर प्रवाहित हो। ध्यान दें कि यह अनुभव बहुत अधिक तीव्र या असहज न हो; यदि हो, तो अपने अभ्यास को थोड़ा हल्का करें।

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