Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

नाम शबद जपते वकत अपने भीतर शोर क्यू सुनाई देता है

 नाम शबद जपते वकत अपने भीतर शोर क्यू सुनाई देता है?


जब हम नाम शबद (मंत्र) का जप करते हैं, तो मन की गहराइयों में संचित विचार, भावनाएँ और आंतरिक तरंगें सक्रिय हो जाती हैं। प्रारंभ में, हमारा चित्त बाहरी और आंतरिक अशांत ध्वनियों (शोर) को सुनता है, क्योंकि मन अभी पूरी तरह शांत नहीं हुआ होता। यह शोर अधूरी ध्यान अवस्था का संकेत हो सकता है, जहाँ अंतर्मन की अव्यवस्थित तरंगें उभरने लगती हैं। जैसे-जैसे साधना गहरी होती है, यह शोर स्वतः शांत हो जाता है और दिव्य अनाहत नाद प्रकट होने लगता है। निरंतर अभ्यास से ध्यान स्थिर होता है और आंतरिक शांति का अनुभव होता है।

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