Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se
नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।
गुरुजी प्रणाम इन दिनो मुझे आज्ञा चक्र पर बहोत खींचाव हो रहा है जिससे मुझे बहोत डर लाग रहा है सर भी भारी हो रहा है इस बजह से मैने ध्यान करना छोड दिया हैं तो ऐसे समय में मै क्या करू जी थोडा मार्गदर्शन करे.
ReplyDeleteguru ji nhane k baad hath ki ungliyo mein crunt lgta hai bht jor ka kisi b wstu ko touch krti hu to crunt lgta hai kirpyea btaye🙏🙏
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