Naad ko drasta bhav se sune ya sadharan tarike se

 नाद को द्रष्टा भाव से सुनना ही बेहतर माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप नाद को सुनने की कोशिश या उसमें हस्तक्षेप न करें, बल्कि शांत होकर केवल साक्षी बनकर उसे सुनें। ध्यान को नाद पर टिकाएँ, लेकिन यह अपेक्षा न रखें कि कोई विशेष ध्वनि अवश्य सुनाई दे। नाद तेज हो, धीमा हो, बदलता रहे या कुछ समय के लिए बंद हो जाए—हर स्थिति में केवल साक्षी बने रहें। उसे पकड़ने, बढ़ाने या उसका अर्थ निकालने की कोशिश न करें। धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने पर सूक्ष्म ध्वनि अधिक स्पष्ट अनुभव हो सकती है। यही द्रष्टा भाव की साधना है।

Please mere question ka uter deje me apne Guru Ji ka dyan kerti thi dyan bhi kerti thi or unko bhat ker dekhati rahti thi per me ....

 Please mere question ka uter deje me apne Guru Ji ka dyan kerti thi dyan bhi kerti thi or unko bhat ker dekhati rahti thi per me Guru ke yaad me ya unke pyer me kerti thi mujhe nahi pata tha ke age kya hoga fir mujhe aagya chaker per aankh dikhne lagi fir me derne lag gye mere anargy sir tak phach gyi der ke dab chod diya ab sab chode one month se uper ho gya per jo urja wo tang kerti hai tang matlab left aankh per face per pora din wo kaise theek ho kirpa kerke uter deje ?


आपका अनुभव एक गहन आध्यात्मिक प्रक्रिया का भाग है। आपने अपने गुरुजी के चरणों में ध्यान लगाया, जिससे आपके भीतर श्रद्धा और ऊर्जा का प्रवाह शुरू हुआ। यह प्रेम और समर्पण से उत्पन्न शक्ति थी — जो आज्ञा चक्र तक पहुँच गई। जब ऊर्जा सिर तक पहुँचती है और साधक तैयार नहीं होता, तब डर, घबराहट, या शारीरिक असुविधा (जैसे आंख या चेहरे पर दबाव) होना सामान्य है। आपने डर के कारण अभ्यास छोड़ दिया, पर ऊर्जा एक बार जाग जाती है तो वह शांत किए बिना रुकती नहीं।

उपाय:

  1. अनुलोम-विलोम दिन में 2 बार 10 मिनट करें — यह ऊर्जा को संतुलित करेगा।

  2. गुरु मंत्र या “ॐ शांतिः शांतिः शांतिः” का जाप करें – डर हटेगा।

  3. ध्यान में वापस धीरे-धीरे लौटें – बस सांस पर ध्यान दें, कुछ visualize न करें।

  4. आंखों पर ठंडी पट्टी रखें – दबाव कम होगा।

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